सात चिरंजीवी: हिंदू ग्रंथों में अद्भुत अमर जीव

हमारे धर्म ग्रंथो में अमरता के वरदानों के बारें में बहुत सी कहानिया है जिनमे भगवान के द्वारा मनुष्यों को चिरंजीवी होने के वेरदान दिये गए है । लेकिन आज भी हमारे यहाँ पृथ्वी में चिरंजीवी मौजूद है और उनकी संख्या 7 है । जो की इस प्रकार है-:

1. अश्वथामा

2. राजा बली

3. वेद व्यास

4. हनुमान

5. विभीषण

6. कृपाचार्य

7. परशुराम


ये सात चिरंजीवी है जो आज भी पृथ्वी पर ह। कहते है के जब कलयुग के काल नेमि को दंड देने के लिए भगवान विष्णु जी कल्कि अवतार लेंगे तब ये सातों चिरंजीवी भगवान कल्कि का साथ देंगे कलनेमी नमक राक्षश से लड़ने के लिए । इन 7 चिरंजीवियों की भी अमर होने की एक कहानी है जो की हम यहाँ बताएँगे जो की निम्न है :-




1. अश्वथामा:- अश्वत्थामा पांडवों और कौरवों के गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र है। वह महाभारत का अमर पात्र है, जिसे ना तो युद्ध में कोई मार पाया और ना युद्ध बाद। पौराणिक गाथाओं में जितने भी लोग चिरंजीवी हैं, उन सभी के लिए यह वरदान है, सिर्फ अश्वत्थामा को छोड़कर। अश्वथामा के लिए अमरत्व वरदान नहीं, बल्कि श्राप है। भगवान श्रीकृष्ण ने उसे चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया था।अश्वत्थामा प्रतिशोध की आग में जल रहा था। वह युद्ध समाप्त होने के बाद पांडव शिविर में पहुंचा। वहां पांडवों के पांच पुत्र सो रहे थे। अश्वत्थामा उन्हें पांडव समझ कर मार आया। उसने उत्तरा की कोख में पल रहे अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित पर भी ब्रह्मास्त्र चलाकर पांडवों के वंश का समूल नाश करने का प्रयास किया। भगवान श्रीकृष्ण उसके इस कृत्य से बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने अश्वत्थामा के माथे की मणि निकलवा ली और उसे चिरकाल तक भटकते रहने का श्राप दिया।




कहते हैं कि अश्वत्थामा के माथे से मणि के स्थान से मवाद बहता रहता है। उससे जुड़ी कई किवदंतियां भी हैं, जिनमें दावा किया जाता है कि वह कई मंदिरों में आकर पूजा करता है, मवाद को रोकने के लिए घी जैसी चीज़ें मांगता है।




2. कृपाचार्य:-  कृपाचार्य के बारे में एक कथा का भी उल्लेख करते हैं। विद्वान गौतम के एक पौत्र थे। नाम था शरद्वान। वह धनुष और तीर से जन्मे थे। धनुर्विद्या में धरती पर उनके सामने टिकने वाला कोई नहीं था। एक बार वह घोर तपस्या में लीन हो गए, तो इंद्र और दूसरे देवता डर गए कि कहीं देवलोक पर कोई संकट ना आ जाए।


देवराज इंद्र ने शरद्वान की तपस्या भंग करने के लिए नामपदी अप्सरा को भेजा। लेकिन, अप्सरा के मोहजाल में नहीं फंसे शरद्वान। हालांकि, एक पल के लिए उन्होंने अपना नियंत्रण ज़रूर खोया। इससे उनके वीर्य की बूंद दो सरकंडों पर गिर गई। इसी से एक लड़का और एक लड़की का जन्म हुआ।






नामपदी अप्सरा ने दोनों बच्चों को वहीं छोड़ दिया। उसी दौरान हस्तिनापुर के महाराज शांतनु वहां से गुजरे। उन्होंने दोनों को अपना लिया और उनका लालन-पालन किया। चूंकि बच्चों पर शांतनु की कृपा पड़ी, इसलिए लड़के का नाम कृप और लड़की का नाम कृपी रखा गया।

कहा जाता है कि कृपाचार्य कौरवों की तरफ से लड़ते हुए भी उन्हें समझाते रहे कि वे पांडवों से संधि कर लें। कृपाचार्य की तटस्थता के कारण उन्हें चिरंजीवी होने का वरदान मिला। कृपाचार्य भी कलियुग के संधिकाल की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जब भगवान विष्णु कल्कि रूप में अवतार लेंगे और अधर्मियों का विनाश करके धर्म की स्थापना करेंगे।





3. वेद व्यास :- वेद व्यास का जन्म यमुना के बीच एक द्वीप द्वैपायन पर हुआ। सांवला रंग होने के कारण यह कृष्णद्वैपायन कहलाए। उन्होंने चारों वेद- ऋग्वेद, अथर्ववेद, सामवेद और यजुर्वेद का संपादन किया। साथ ही, सभी 18 पुराणों, महाभारत और श्रीमद्भागवत गीता की रचना की। कहा जाता है कि महर्षि वेद व्यास जी के कथनानुसार ही भगवान गणेश ने महाभारत लिखी थी।

व्यास ऋषि पराशर और निषाद कन्या सत्यवती के पुत्र हैं। वह जन्म लेते ही युवा हो गए और तपस्या करने द्वैपायन चले गए। सत्यवती के कहने पर वेद व्यास ने विचित्रवीर्य की पत्नी अंबिका और अंबालिका को अपनी शक्ति से धृतराष्ट्र और पांडु नामक दो पुत्र दिए। एक दासी से विदुर का जन्म हुआ। इन तीन पुत्रों में धृतराष्ट्र को जब कोई पुत्र नहीं हुआ, तब भी वेद व्यास की कृपा से ही 99 पुत्र और एक पुत्री का जन्म हुआ।

महर्षि वेद व्यास ने महाभारत का युद्ध देखने के लिए संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की। संजय ने इसी दिव्य दृष्टि से धृतराष्ट्र को पूरे युद्ध का वर्णन हस्तिनापुर राजमहल में रहते हुए सुनाया। इतनी विशेषताओं वाले वेद व्यास को धर्म ग्रंथों में ईश्वर का ही अवतार माना गया है। शास्त्र कहते हैं कि महर्षि व्यास तीनों कालों के ज्ञाता थे। उन्होंने दिव्य दृष्टि से पहले ही यह देख लिया कि कलियुग में धर्म कमजोर पड़ेगा। धार्मिक उत्थान के लिए उनकी ज़रूरत पड़ेगी, इसलिए उन्होंने धरती पर रहने का निर्णय किया।









4. हनुमान :- हनुमानजी की माता का नाम अंजना है, जो अपने पूर्व जन्म में एक अप्सरा थीं। हनुमानजी के पिता का नाम केसरी है, जो वानर जाति के थे। माता-पिता के कारण हनुमानजी को आंजनेय और केसरीनंदन कहा जाता है। केसरीजी को कपिराज कहा जाता था, क्योंकि वे वानरों की कपि नाम की जाति से थे। केसरीजी कपि क्षेत्र के राजा थे। कपिस्थल कुरु साम्राज्य का एक प्रमुख भाग था। हरियाणा का कैथल पहले करनाल जिले का भाग था। यह कैथल ही पहले कपिस्थल था। कुछ लोग मानते हैं कि यही हनुमानजी का जन्म स्थान है।हनुमानजी इस कलयुग के अंत तक अपने शरीर में ही रहेंगे। वे आज भी धरती पर विचरण करते हैं। हनुमानजी को धर्म की रक्षा के लिए अमरता का वरदान मिला था। इस वरदान के कारण आज भी हनुमानजी जीवित हैं और वे भगवान के भक्तों तथा धर्म की रक्षा में लगे हुए हैं। जब कल्कि रूप में भगवान विष्णु अवतार लेंगे तब हनुमान, परशुराम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, विश्वामित्र, विभीषण और राजा बलि सार्वजनिक रूप से प्रकट हो जाएंगे।

यदि मनुष्य पूर्ण श्रद्घा और विश्वास से हनुमानजी का आश्रय ग्रहण कर लें तो फिर तुलसीदासजी की भांति उसे भी हनुमान और राम-दर्शन होने में देर नहीं लगेगी। कलियुग में हनुमानजी ने अपने भ‍क्तों को उनके होने का आभास कराया है।

ये वचन हनुमानजी ने ही तुलसीदासजी से कहे थे- 'चित्रकूट के घाट पै, भई संतन के भीर। तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर।हनुमानजी कलियुग में गंधमादन पर्वत पर निवास करते हैं, ऐसा श्रीमद् भागवत में वर्णन आता है। उल्लेखनीय है कि अपने अज्ञातवास के समय हिमवंत पार करके पांडव गंधमादन के पास पहुंचे थे। एक बार भीम सहस्रदल कमल लेने के लिए गंधमादन पर्वत के वन में पहुंच गए थे, जहां उन्होंने हनुमान को लेटे देखा और फिर हनुमान ने भीम का घमंड चूर कर दिया था।कलियुग में जहां-जहां भगवान श्रीराम की कथा-कीर्तन इत्यादि होते हैं, वहां हनुमानजी गुप्त रूप से विराजमान रहते हैं। सीताजी के वचनों के अनुसार- 'अजर-अमर गुन निधि सुत होऊ।। करहु बहुत रघुनायक छोऊ।





5. विभीषण:- हनुमान जी के साथ ही प्रभु श्रीराम के एक और अन्नय भक्त थे राक्षस राज विभीषण। जो की राक्षस कुल में पैदा होने के बाद भी नीति और सत्य के प्रति कर्तव्य निष्ठ रहे। हालांकि विभीषण को कुल नाशक के नाम से कलंकित किया जाता है, लेकिन विभीषण ने परिवार से अधिक नीति और धर्म का साथ दिया। विभीषण ने अपने बड़े भाई रावण और सभी राक्षसों को अनीति के रास्ते पर चलने से मना किया था। लेकिन अपनी शक्ति के मद में चूर रावण उसकी एक नहीं सुनी और उसे घर से निकाल दिया। भगवान राम के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा और भक्ति के कारण प्रभु श्रीराम ने न केवल विभीषण को लंका का राज्य सौंपा, बल्कि अनंत काल तक धर्म की रक्षा का कर्तव्य भी दिया। प्रभु श्री राम के इसी वरदान के कारण विभिषण आज भी जीवित हैं और प्रातः स्मरणीय चिरंजीवीयों में शामिल हैं।


6. कृपाचार्य:- गौतम ऋषि के पुत्र का नाम शरद्वान था। उनका जन्म बाणों के साथ हुआ था। उन्हें वेदाभ्यास में थोडा़ भी रुचि नहीं थी और धनुर्विद्या से उन्हें अत्यधिक लगाव था। वे धनुर्विद्या में इतने निपुण हो गये कि देवराज इन्द्र उनसे भयभीत रहने लगे। इन्द्र ने उन्हें साधना से डिगाने के लिये नामपदी नामक एक देवकन्या को उनके पास भेज दिया। उस देवकन्या के सौन्दर्य के प्रभाव से शरद्वान इतने कामपीड़ित हुये कि उनका वीर्य स्खलित हो कर एक सरकंडे पर आ गिरा। वह सरकंडा दो भागों में विभक्त हो गया जिसमें से एक भाग से कृप नामक बालक उत्पन्न हुआ और दूसरे भाग से कृपी नामक कन्या उत्पन्न हुई। कृप भी धनुर्विद्या में अपने पिता के समान ही पारंगत हुये। भीष्म जी ने इन्हीं कृप को पाण्डवों और कौरवों की शिक्षा-दीक्षा के लिये नियुक्त किया और वे कृपाचार्य के नाम से विख्यात हुये।


कृपाचार्य कौरवों और पांडवों के गुरू थे। सात चिरंजीवियों में वे भी एक हैं।

कृपाचार्य महर्षि गौतम शरद्वान्‌ के पुत्र। शरद्वान की तपस्या भंग करने के लिए इंद्र ने जानपदी नामक एक देवकन्या भेजी थी, जिसके गर्भ से दो यमज भाई-बहन हुए। पिता-माता दोनों ने इन्हें जंगल में छोड़ दिया जहाँ महाराज शांतनु ने इनको देखा। इनपर कृपा करके दोनों को पाला पोसा जिससे इनके नाम कृप तथा कृपी पड़ गए। इनकी बहन कृपी का विवाह द्रोणाचार्य से हुआ और उनके पुत्र अश्वत्थामा हुए। अपने पिता के ही सदृश कृपाचार्य भी परम धनुर्धर हुए। कुरुक्षेत्र के युद्ध में ये कौरवों के साथ थे और उनके नष्ट हो जाने पर पांडवों के पास आ गए। बाद में इन्होंने परीक्षित को अस्त्रविद्या सिखाई। भागवत के अनुसार सावर्णि मनु के समय कृपाचार्य की गणना सप्तर्षियों में होती है ।




7. परशुराम:- परशुराम जी त्रेता युग (रामायण काल) में एक भट्ट ब्राह्मण ऋषि के यहाँ जन्मे थे। जो विष्णु के छठा अवतार हैं[1]। पौरोणिक वृत्तान्तों के अनुसार उनका जन्म महर्षि भृगु के पुत्र महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को मध्यप्रदेश के इन्दौर जिला में ग्राम मानपुर के जानापाव पर्वत में हुआ। वे भगवान विष्णु के आवेशावतार हैं। महाभारत और विष्णुपुराण के अनुसार परशुराम जी का मूल नाम राम था किन्तु जब भगवान शिव ने उन्हें अपना परशु नामक अस्त्र प्रदान किया तभी से उनका नाम परशुराम जी हो गया। पितामह भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के अनन्तर राम कहलाए। वे जमदग्नि का पुत्र होने के कारण जामदग्न्य और शिवजी द्वारा प्रदत्त परशु धारण किये रहने के कारण वे परशुराम जी कहलाये। आरम्भिक शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचीक से शार्ङ्ग नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र प्राप्त हुआ। तदनन्तर कैलाश गिरिश्रृंग पर स्थित भगवान शंकर के आश्रम में विद्या प्राप्त कर विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया। शिवजी से उन्हें श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए। चक्रतीर्थ में किये कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें त्रेता में रामावतार होने पर तेजोहरण के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया।






वे शस्त्रविद्या के महान गुरु थे। उन्होंने भीष्मद्रोण व कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी। उन्होनें कर्ण को श्राप भी दिया था। उन्होंने एकादश छन्दयुक्त "शिव पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र" भी लिखा। इच्छित 

फल-प्रदाता परशुराम गायत्री है-"ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि,तन्नःपरशुराम: प्रचोदयात्।" वे पुरुषों के लिये आजीवन एक पत्नीव्रत के पक्षधर थे। उन्होंने अत्रि की पत्नी अनसूया, अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा व अपने प्रिय शिष्य अकृतवण के सहयोग से विराट नारी-जागृति-अभियान का संचालन भी किया था। अवशेष कार्यो में कल्कि अवतार होने पर उनका गुरुपद ग्रहण कर उन्हें शस्त्रविद्या प्रदान करना भी बताया गया है। उन्होंने 21 बार क्षत्रिय विहीन किये थे।


ये सभी 7 चिरंजीवी थे लेकिन इन चिरंजीवियों का कलयुग में होना अपने आप के ये तो एक संकेत देता है के ये सब कलयुग की किसी बड़ी घटना में अपना योगदान देने के लिए यहाँ पर है और उसके पश्चात ये सभी भागवत धाम में जाएंगे । दोस्तों इस जानकारी को अपने चाहने वालों को जरूर शेयर करें जिससे की सबको हमारे सनातन धर्म के बारें में पता चले की कीयतना महान है । जय श्री राम ।